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शुक्रवार, ३ एप्रिल, २०२६

*“अहिंसा ही पराक्रम: महावीर जयंती उपलक्ष्य असीम शुभकामनाये'*

 चांदभाई शेख- पुणे



आज जब पूरा विश्व संघर्ष, हिंसा और युद्ध की विभीषिका से जूझ रहा है, ऐसे समय में भगवान महावीर का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। महावीर जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और मानवता के मूल्यों को पुनः जागृत करने का अवसर है।

दुनिया के कई हिस्सों में आज भी युद्ध की आग धधक रही है। राष्ट्र अपनी शक्ति, संसाधन और वर्चस्व सिद्ध करने की होड़ में मानवता को कुचलने पर आमादा हैं। लेकिन यह कटु सत्य हमें स्वीकार करना ही होगा कि कल के भविष्य को रौंदकर कोई भी विजयी नहीं हो सकता। युद्ध भले ही तात्कालिक विजय का भ्रम दे, परंतु वह आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाश, पीड़ा और अस्थिरता की विरासत छोड़ जाता है।

इतिहास साक्षी है कि कोई भी देश केवल अपने बलबूते स्थायी महासत्ता नहीं बन सकता। शक्ति का वास्तविक आधार सहयोग, सहअस्तित्व और मानवीय मूल्यों में निहित होता है। जो स्वयं को महासत्ता कहलवाने की होड़ में लगे हैं, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि भय और विनाश के आधार पर खड़ा किया गया साम्राज्य कभी स्थायी नहीं होता।

भगवान महावीर स्वयं अत्यंत पराक्रमी थे, परंतु उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा पराक्रम क्षमा, संयम और अहिंसा में निहित होता है। उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में अहिंसा को सर्वोच्च धर्म के रूप में स्थापित किया। यही कारण है कि वे केवल विजेता नहीं, बल्कि “महावीर” कहलाए—वह वीर, जिसने अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और हिंसा पर विजय प्राप्त की।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम महावीर के विचारों को केवल पूजा तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और वैश्विक दृष्टिकोण का आधार बनाएं। जब तक विश्व के नागरिक, बुद्धिजीवी और नेतृत्व वर्ग युद्ध के विरुद्ध मुखर नहीं होंगे, तब तक शांति केवल एक आदर्श बनी रहेगी, वास्तविकता नहीं।

इस महावीर जयंती पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम हिंसा, द्वेष और युद्ध की मानसिकता के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज उठाएँगे। हम मानवता, करुणा और सहअस्तित्व के मूल्यों को पुनः स्थापित करने का प्रयास करेंगे।

यही इस पावन दिवस का सच्चा औचित्य है—अहिंसा को अपनाना, शांति का मार्ग चुनना और पूरी दुनिया को यह संदेश देना कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं।


- चाँद शेख, पुणे.

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